नई दिल्ली : मानसून सत्र के आखिरी दिन गृह मंत्री अमित शाह ने तीन ऐतिहासिक बिल पेश किए. इनका उद्देश्य अंग्रेजों के समय के कानूनों को खत्म करना है. गृह मंत्री ने आईपीसी, सीआरपीसी और साक्ष्य कानूनों में संशोधन के लिए बिल पेश किए.
उन्होंने कहा कि इन बिलों के पास हो जाने के बाद हमारे कानूनों पर अंग्रेजों की ‘छाया’ खत्म हो जाएगी. बिल पेश करते हुए शाह ने कहा कि आज भी इन कानूनों में ऐसे कई प्रावधान हैं, जिनमें अंग्रेजों के समय के शब्दों, प्रतीकों और उनके यहां के जगहों का जिक्र यथावत है. बिल पेश करते हुए गृह मंत्री ने इन बिलों पर विस्तार से चर्चा के लिए सिलेक्ट कमेटी के पास भेजने की प्रार्थना की.
तीनों विधेयक यदि क़ानून बनते हैं, तो क्रमश: भारतीय दंड संहिता (आईपीसी 1860), भारतीय साक्ष्य अधिनियम (आईईए 1872) और दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी 1973) की जगह ले लेंगे.
गृहमंत्री अमित शाह ने कहा, “इस विधेयक के ज़रिए हमने सज़ा के अनुपात को 90 प्रतिशत के ऊपर ले जाने का लक्ष्य रखा है. इसलिए, हम एक अहम प्रावधान लाए हैं कि जिन धाराओं में 7 साल या उससे अधिक जेल की सज़ा का प्रावधान है, उन सभी मामलों में फॉरेंसिक टीम का अपराध स्थल पर जाना अनिवार्य होगा.”
उन्होंने कहा, “1860 से 2023 तक देश की आपराधिक न्याय प्रणाली अंग्रेज़ों द्वारा बनाए गए क़ानूनों के अनुसार काम करती रही है. ये तीनों क़ानून बदल जाएंगे, जिससे देश में आपराधिक न्याय प्रणाली में बड़ा बदलाव हो जाएगा.”